ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम 1793, या चार्टर अधिनियम 1793 , ग्रेट ब्रिटेन की संसद का एक अधिनियम था जिसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (ईआईसी) को जारी किए गए चार्टर को बीस साल के लिए नवीनीकृत किया , जिससे उसे उस अवधि के दौरान भारत में सभी क्षेत्रों पर कब्जा मिल गया और भारत में कंपनी का शासन जारी रहा।
पिछले दो दशकों में ब्रिटिश भारत से संबंधित प्रस्तावित कानूनों के विपरीत, 1793 का अधिनियम “न्यूनतम परेशानी के साथ पारित हुआ”।
इस अधिनियम ने भारत में सरकार की प्रणाली या कंपनी की गतिविधियों पर ब्रिटिश निगरानी में बहुत ही न्यूनतम परिवर्तन किए।
कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार अगले 20 वर्षों तक जारी रहा। इसके बाद , 1813 के चार्टर अधिनियम द्वारा कंपनी के चार्टर का नवीनीकरण किया गया ।
अधिनियम के प्रावधान:
अधिनियम ने कंपनी के राजनीतिक कार्यों को मान्यता दी और स्पष्ट रूप से स्थापित किया कि “क्राउन के विषयों द्वारा संप्रभुता का अधिग्रहण क्राउन की ओर से है, न कि उसके अपने अधिकार में।”
कंपनी को अपना लाभांश 10% तक बढ़ाने की अनुमति दी गई।
1793 के चार्टर एक्ट में यह प्रावधान किया गया कि कंपनी भारतीय राजस्व से आवश्यक व्यय, ब्याज, लाभांश, वेतन आदि का भुगतान करने के बाद अधिशेष राजस्व में से ब्रिटिश सरकार को प्रतिवर्ष 5 लाख ब्रिटिश पाउंड का भुगतान करेगी।
भारतीय प्रशासन:
गवर्नर-जनरल को मद्रास और बम्बई के अधीनस्थ प्रेसिडेंसियों पर व्यापक अधिकार प्रदान किये गये।
इस प्रकार बम्बई और मद्रास के गवर्नरों को अधिक निर्णायक रूप से उनके नियंत्रण में लाया गया।
गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में परिषद के बहुमत की अवहेलना करने का अधिकार दिया गया । इस प्रकार उसे और अधिक शक्तियाँ सौंपी गईं ।
गवर्नर जनरल और अन्य प्रेसीडेंसी के संबंधित गवर्नर अब संबंधित परिषदों को दरकिनार कर सकते थे।
इसलिए कॉर्नवॉलिस को अपनी नियुक्ति के समय अपनी परिषद को दरकिनार करने की जो शक्ति विशेष रूप से दी गई थी, उसे सभी भावी गवर्नर-जनरलों और गवर्नरों तक बढ़ा दिया गया।
अब कमांडर -इन-चीफ गवर्नर जनरल की परिषद का सदस्य नहीं था , जब तक कि उसे कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा विशेष रूप से सदस्य नियुक्त न किया गया हो।
बंगाल में ब्रिटिश क्षेत्रों के आंतरिक शासन के लिए लागू किए जा सकने वाले सभी नियमों की एक नियमित संहिता तैयार की गई।
यह विनियमन भारतीय लोगों के सभी अधिकारों, व्यक्ति और संपत्ति पर लागू होता था और इसने न्यायालयों को इसमें निहित नियमों और निर्देशों के अनुसार अपने निर्णयों को विनियमित करने के लिए बाध्य किया।
सभी कानूनों को भारतीय भाषाओं में अनुवाद के साथ मुद्रित किया जाना था, ताकि लोग अपने अधिकारों, विशेषाधिकारों और प्रतिरक्षा के बारे में जान सकें।
इस अधिनियम ने भारत में एक धर्मनिरपेक्ष मानव एजेंसी द्वारा अधिनियमित और सार्वभौमिक रूप से लागू नागरिक कानून की अवधारणा को प्रस्तुत किया ।
इस अधिनियम ने न्यायालयों का पुनर्गठन किया तथा उनके अधिकार क्षेत्र को पुनः परिभाषित किया।
राजस्व प्रशासन को न्यायिक कार्यों से अलग कर दिया गया और इसके परिणामस्वरूप माल अदालतें लुप्त हो गईं।
गृह सरकार:
गृह सरकार के संबंध में, नियंत्रण बोर्ड के प्रथम-नामित आयुक्त को इसका अध्यक्ष बनाया गया। दो कनिष्ठ सदस्यों को अब प्रिवी काउंसिल का सदस्य होने की आवश्यकता नहीं थी।
नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारियों और वेतनभोगी सदस्यों का वेतन भी अब कंपनी से लिया जाने लगा।
इसलिए भविष्य में सभी सदस्यों को वेतन सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि भारतीय राजस्व से दिया जाना था। यह प्रथा 1919 तक जारी रही।
गवर्नर-जनरल, गवर्नरों और कमांडर-इन-चीफ की नियुक्ति के लिए शाही अनुमोदन अनिवार्य था।
वरिष्ठ अधिकारियों को बिना अनुमति के भारत छोड़ने पर रोक लगा दी गई ।
यदि कोई उच्च अधिकारी बिना अनुमति के भारत से चला जाता था तो इसे त्यागपत्र माना जाता था।
ईआईसी को भारत में व्यापार करने के लिए व्यक्तियों और कंपनी के कर्मचारियों दोनों को लाइसेंस देने का अधिकार दिया गया (जिसे “ विशेषाधिकार ” या “देश” व्यापार के रूप में जाना जाता है ), जिसने चीन को अफीम के शिपमेंट का मार्ग प्रशस्त किया।
विलियम विल्बरफोर्स अधिनियम में दो और धाराएं शामिल करना चाहते थे:
कोई यह घोषित कर सकता है कि भारत में ब्रिटिश शासन का उद्देश्य भारतीयों के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान की दिशा में काम करना होगा और उस साम्राज्यवादी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षकों और मिशनरियों जैसे उपयुक्त व्यक्तियों को भारत में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी ।